आहट मेरे कदमों की

कदम-कदम पे मौत यूं अगर होगी
कैसे फिर जिन्दगी बसर होगी

आ सके नींद जिसमें खुलकर के
रात की वो आखरी पहर होगी

नहीं लगता दरख्त की छाँव भी
नसीब दरम्याने - सफर होगी

तारे गिनते रहे सारी रात 
जाकर तब कहीं सहर होगी

कुरेदा आज जहाँ जख्मों को
कल वो जमीन भी बंजर होगी

आज भी देखा पलट अंधेरों ने
बात यही आगे उम्रभर होगी

पड़े जो हमपे जिन्दगी बन कर
वो तो बस मौत की नजर होगी

अक्तूबर 1976


डगर डगर से जुड़ने तक 
मगर नजर में मुड़ने तक

फैल गयी है चाहत खूब
हथेली के सिकुड़ने तक

तूफानों का जोर रहा
दरख्त के उखड़ने तक

तारे सारे लुट गए
सूरज के निकलने तक

दिसम्बर 1976

इक बार भी न देखा खुशियों ने मुझे मुड़कर
वरना दूर तक किया था पीछा मेरी नजर ने

तारों की रोशनी ने कहा मुझे ठिठक कर
इस रात से तो नाता तोड़ा है हर सहर ने

इस कारवां से कोई पल भर तो दे सहारा
कितना थका दिया है तन्हाई के सफर ने

मैं तो साथ जिन्दगी के चुपचाप चल रहा था
चौंका दिया है मुझ को मेरी मौत की खबर ने

‘दिसम्बर 1976

यहां न हो मौजूद वो कोई दवा नही
मैं कैसा दर्दमन्द हूं दर्द का पता नहीं

हमने तो अपने दिल में तुझको बसा लिया
अपना ही घर आजतक कहीं बसा नहीं

कमी है तो बस इक बहार की यहां
वरना मेरे चमन में कहो बाकि क्या नहीं

हम भी न होंगे इतने बुरे तेरे लिये जब
अपने लिए तेरा दिया गम भी बुरा नहीं

जनवरी 1977

जो बात सोचता था मैं कि मुझ ही में होगी
यह जानता नहीं था कि वो सभी में होगी

तुझे ढूंढता रहा था यह शक लिए हुए कि
तू कल्पना के बाहर भी इस जमीं में होगी

अब देखना है कब तक मैं धूप में तपूंगा
कहीं तो खुशी की छांव मेरी जिन्दगी में होगी

मैं आज टहल लूंगा बस अपनी ही गली में 
आहट मेरे कदमों की तेरी गली में होगी

जनवरी 1977






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