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1979 में लिखी कुछ ग़ज़लें

दोनों के बीच ख़ामोश था फेला हुआ अंधेरा जजबातों का उजाला बनता गया अंधेरा दीदार की हसरत से गये थे उस महफिल में जितने करीब आये , उतना हुआ अंधेरा शम्मा की रोशनी की हसरत से जल गये थे अब चैन सा है हमने जबसे छुआ अंधेरा दिल में किसी नज़र के चराग जल रहे हैं नज़रों में है समाया किसी ज़ुल्फ का अंधेरा चेहरे से जाने किसके मिलता है उसका चेहरा अपनों से बढ़के अपना लगने लगा अंधेरा थक कर शमा ने अपने सर से उतार दी लौ इस दिल की लौ में कब तक जलता रहा अंधेरा (27-04-1979) अपना कह लेने की तलब किसी को ख़ुदा करे कि न हो अब किसी को खुशी न पूछे अब कोई मुझसे मेरे ग़मों से क्या मतलब किसी को  मंजिले भी हैं तलाशे मंजिल यहां पे ढूंढते हैं सब किसी को किसी पे मरने का सबब ढूंढे जीने का मान लें सबब किसी को .. 28-04-1979 करीब कुछ नहीं मौहूम सा . अहसास ही है बस इक नज़र के सिवा दूरियां किस बात की है जुदाई से ही तो बढ़ती है वस्ल की कीमत फासले और घटाने को ही यह दूरी बनी है कुछ कदम मौत के करीब जा के देखेंगे ज़िन्दगी के लिए अब और क्या द...

आहट मेरे कदमों की

कदम-कदम पे मौत यूं अगर होगी कैसे फिर जिन्दगी बसर होगी आ सके नींद जिसमें खुलकर के रात की वो आखरी पहर होगी नहीं लगता दरख्त की छाँव भी नसीब दरम्याने - सफर होगी तारे गिनते रहे सारी रात  जाकर तब कहीं सहर होगी कुरेदा आज जहाँ जख्मों को कल वो जमीन भी बंजर होगी आज भी देखा पलट अंधेरों ने बात यही आगे उम्रभर होगी पड़े जो हमपे जिन्दगी बन कर वो तो बस मौत की नजर होगी अक्तूबर 1976 डगर डगर से जुड़ने तक  मगर नजर में मुड़ने तक फैल गयी है चाहत खूब हथेली के सिकुड़ने तक तूफानों का जोर रहा दरख्त के उखड़ने तक तारे सारे लुट गए सूरज के निकलने तक दिसम्बर 1976 इक बार भी न देखा खुशियों ने मुझे मुड़कर वरना दूर तक किया था पीछा मेरी नजर ने तारों की रोशनी ने कहा मुझे ठिठक कर इस रात से तो नाता तोड़ा है हर सहर ने इस कारवां से कोई पल भर तो दे सहारा कितना थका दिया है तन्हाई के सफर ने मैं तो साथ जिन्दगी के चुपचाप चल रहा था चौंका दिया है मुझ को मेरी मौत की खबर ने ‘दिसम्बर 1976 यहां न हो मौजूद वो कोई दवा नही मैं कैसा दर्दमन्द हूं दर्द का पता नहीं हमने तो अपने दिल में तुझको बसा लिया अपना ही घर आजतक कहीं बसा...

मीलों है ख़ामोशी

  मीलों है ख़ामोशी ( जो दिल ने कहा ) संदर्भ : गीता - मेरी पत्नी की मृत्यू के बाद अपनी निराशाओं से घिरी मनःस्थिति से उभरने के लिये मैंने ये कुछ व्हाट्सएप पत्र निशी को लिखे . बाद में कुछ और मेरे अज़ीज़ मित्र भी इस में शामिल हुए . शायद इस संवाद का कोई  सार्वजनिक मुल्य न हो लेकिन किसी को भी ( यहां तक कि मुझे भी ) कैसी भी अवसाद वाली स्थिति से उभरने में यह सहायक हो सकते हैं । मैं इन्हे पढ़ता हूं तो कुछ अच्छा सा लगता है .  "नहीं मैडम . यह, जैसा मैंने कहा , उस हिसाब से या उस फोर्मेट में नहीं लिखी गयी है . यह तो अपने मित्र को भेजे गये व्यक्तिगत सदेश हैं . यह एक मृत्युबोध की तरह है . यह मृत्यु से जीवन तक वापसी का एक लिपिबद्ध दस्तावेज मात्र है . इसमें कुछ भी प्रकाशन के योग्य नहीं है : और वैसे भी यह अभी अधूरा है .हां कभी मन किया तो ऐसा कुछ जरूर लिखूंगा . " . . . . . . . . . . .इसी श्रृंखला से उदृत . 03.09.2021 किसका रस्ता देखे, ऐ दिल, ऐ सौदाई मीलों है खामोशी, बरसों है तनहाई भूली दुनिया, कभी की, तुझे भी, मुझे भी फिर क्यों आँख भर आई कोई भी साया नहीं राहों में कोई भी आएगा न बाहों म...

वह कौन है ?

कुछ तो है जो सालता है भीतर ही भीतर कचोटता है, कुछ ताे है जो छूट गया है पीछे बहुत पीछे जाने कहाँ अपने से अलग वह मैं ही हूं.

तुम अब भी वहीं हो

 तुम अब भी वहीं हो जहाँ जहाँ तुम थीं बैठ कर टीवी देखती खिडकी से बाहर ताकती अपने तुलसी के पौधे को निहारती  बच्चों से बतियाती घर में इधर उधर टहलती और मेरे अन्तर्मन में .