मीलों है ख़ामोशी
मीलों है ख़ामोशी
( जो दिल ने कहा )
संदर्भ : गीता - मेरी पत्नी की मृत्यू के बाद अपनी निराशाओं से घिरी मनःस्थिति से उभरने के लिये मैंने ये कुछ व्हाट्सएप पत्र निशी को लिखे . बाद में कुछ और मेरे अज़ीज़ मित्र भी इस में शामिल हुए . शायद इस संवाद का कोई सार्वजनिक मुल्य न हो लेकिन किसी को भी ( यहां तक कि मुझे भी ) कैसी भी अवसाद वाली स्थिति से उभरने में यह सहायक हो सकते हैं । मैं इन्हे पढ़ता हूं तो कुछ अच्छा सा लगता है .
"नहीं मैडम . यह, जैसा मैंने कहा , उस हिसाब से या उस फोर्मेट में नहीं लिखी गयी है . यह तो अपने मित्र को भेजे गये व्यक्तिगत सदेश हैं . यह एक मृत्युबोध की तरह है . यह मृत्यु से जीवन तक वापसी का एक लिपिबद्ध दस्तावेज मात्र है . इसमें कुछ भी प्रकाशन के योग्य नहीं है : और वैसे भी यह अभी अधूरा है .हां कभी मन किया तो ऐसा कुछ जरूर लिखूंगा . "
. . . . . . . . . . .इसी श्रृंखला से उदृत .
03.09.2021
किसका रस्ता देखे, ऐ दिल, ऐ सौदाई
मीलों है खामोशी, बरसों है तनहाई
भूली दुनिया, कभी की, तुझे भी, मुझे भी
फिर क्यों आँख भर आई
कोई भी साया नहीं राहों में
कोई भी आएगा न बाहों में
तेरे लिए, मेरे लिए, कोई नहीं रोने वाला
झूठा भी नाता नहीं चाहों में
तू ही क्यों डूबा रहे आहों में
कोई किसी संग मरे, ऐसा नहीं होने वाला
कोई नहीं जो यूँ ही जहां में, बाँटे पीर पराई
तुझे क्या बीती हुई रातों से
मुझे क्या खोई हुई बातों से
सेज नहीं, चिता सही, जो भी मिले सोना होगा
गई जो डोरी छूटी हाथों से
लेना क्या टूटे हुए साथों से
खुशी जहाँ माँगी तूने, वहीं मुझे रोना होगा
ना कोई तेरा, ना कोई मेरा, फिर किसकी याद आई
... .. साहिर लुधियानवी
मैं ठीक हूं . मेरी फिक्र मत करना . सब रूटीन के काम करता हूँ - कोई देवदास वाली बात नहीं है जैसा तुम्हें मेरी बातों से लगता होगा . बस इतना है कि गीता की यादों में खोया रहना चाहता हूं . इतना तो मेरा हक बनता है बाकि जिंदगी पर .
उसकी यादें मुझे परेशान नहीं करती बल्कि मेरे जीने का सहारा बनती हैं
मुझे लगता है कि वो मेरे साथ है .
अभी उसको गये एक महीना नहीं हुआ है . लेकिन मुझे लगता है जैसे सालों बीत गये .
वो सुबह - सुबह किचन में चाय बनाती हुई
वो सुबह सुबह घर आंगन की सफाई करती हुई
वो सुबह सुबह आंगन में तुलसी को और अपने फूलों को प्यार से निहारती हुई
सब जगह वो है मेरे साथ साथ
सब जगह वो है मेरे साथ साथ
आज सुबह मैंने मौसम में बदलाव देखा .. आने वाली सर्दियों की महक . एक सुखद एहसास . ऐसा ही वो बोला करती थीं . वो ठीक वैसा सोचती थी जैसा मैं सोचता था .
मेरी हमसफर कोई साहित्यकार नहीं थी लेकिन उनमें एक गजब की ऐस्थेटिक सेन्स थी और मेरी इस तरह की बातों को बख़ूबी समझती थीं .
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04.09.2021
रविन्द्र जैन ने अपनी लीक से हट कर यह गज़ल लिखी और संगीतबद्ध की थी - फिल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाये के लिए . यह गजल उनको बहुत पसंद थी और मेरे कहने पर अक्सर मुझे गा कर सुनाती थी . उनके सुर सटीक थे और बडा अच्छा गाती थीं .
अब रंज से ख़ुशी से बहार-ओ-ख़िज़ा से क्या
मह्व-ए-ख़याल यार हैं हम को जहाँ से क्या
उनका ख़याल उनकी तलब उनकी आरज़ू
जिस दिल में वो हो, माँगे किसी महरबाँ से क्या
हम ने चिराग़ रख दिया तूफ़ाँ के सामने
पीछे हटेगा इश्क़ किसी इम्तहाँ से क्या
कोई चले चले न चले हम तो चल पड़े
मंज़िल की धुन हो जिसको उसे कारवाँ से क्या
ये बात सोचने की है वो हो के महरबाँ
पूछेंगे हाल-ए-दिल तो कहेंगे ज़बाँ से क्या
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दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया
दुनिया की आँधियों से भला ये बुझेगा क्या
साँसों की आँच पा के भड़कता रहेगा ये
सीने में दिल के साथ धड़कता रहेगा ये
वो नक़्श क्या हुआ जो मिटाये से मिट गया
वो दर्द क्या हुआ जो दबाये से दब गया
ये ज़िंदगी भी क्या है अमानत उन्हीं की है
ये शायरी भी क्या है इनायत उन्हीं की है
अब वो करम करें कि सितम उन का फ़ैसला
हम ने तो दिल में प्यार का शोला जला लिया
..... साहिर लुधियानवी
( फिल्म : इक महल हो सपनों का )
ये वो गाना है जो गीता ने शादी के तीसरे दिन नाहन घर में पूरे परिवार के बीच सुनाया था .
उसकी सुरीली आवाज आज भी कानों में गूंज रही है .
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क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता
तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख़्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता
प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए ज़िन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता
घर ढूँढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता
वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता.
... वसीम बरेलवी
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06.09.2021
बहुत छोटी - छोटी चीजों में उसने खुशियां ढूंढ कर दीं . एक छोटा सा दो कमरों का CCI का मकान था जिसे उसने घर बनाया . एक बहुत छोटी तनख्वाह से उसने घर में कभी कोई कमी न आने दी अपनी बरकत से . मेरे प्यार से संतुष्ट कभी कोई फरमाइश नहीं की. कभी मायके का नाम न लिया . कैसा भी समय हो - हंसती मुस्कुराती रही . दिल की एकदम पाक साफ . कभी किसी से कुछ झूठ बोलने को कहता तो साफ मना कर देतीं - मुझ से झूठ बोला नहीं जाता जी . गले में फंस जाता है , ऐसा कहतीं . शिव की पुजारिन , सांई बाबा की भक्त . माता वैष्णों को मानने वाली .
ख़ुद को बहुत साधारण मानतीं थीं - लेकिन मेरे लिए वो असाधारण प्रतिभा की धनी थीं .
आज उनको याद करते हुए दिल में एक हूक सी उठती है . काश मैं उन्हें बचा सकता . किसी तरह .
यही बेबसी सालती है .
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08.09.2021
बैंया ना धरो ….
उनके पसंदीदा गानों में से एक . कई बार फरमाइश करके सुनता था उनसे . जो गाने मुझे बेहद पसंद थे वो खाना बनाते हुए रसोई में गाती रहती थीं - मैं बैठे बैठे उस जादू से अभिभूत होता रहता था . पूरे 32 साल का सफर . वो हमेशा मेरे लिए एक 18 साल की नवयुवती रहीं और वैसी ही विदा हुईं .
ये बिछड़ना बहुत दुखद है .
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आज यहाँ लिखते हुए मुझे अपने और गीता के रिश्ते को समझने का मौका भी मिल रहा है . वो कहते हैं कि जबतक कोई शख्स दूर नहीं चला जाता तब तक उसकी अहमियत पूरी तरह समझ में नहीं आती . पहले मुझे सिर्फ यह समझ आता था कि मैं उनसे कितना प्यार करता था ,आज उनके जाने के बाद समझ आ रहा है कि उन्होंने कहीं ज्यादाह मुझ से प्यार किया . मैंने एक साथ बहुतों से प्यार किया - मेरा बंटा हुआ प्यार उन्हें मिला लेकिन उन्होंने एक कोरा - अनबटा प्यार मुझे दिया . उनके लिये सबसे पहले मैं था ... बच्चे , मायका, सबकुछ मेरे बाद था .
वो कहती थीं कि प्यार बताने की चीज होती है छुपाने की नहीं और जिस प्यार को छुपाना पड जाए उसमें जरूर कोई कमी होगी और प्यार अगर सच्चा है तो छुपेगा ही नहीं .
आह
यूं लग रहा है वो मेरे सामने बैठीं प्यारी सी मुस्कान के साथ यह सब कह रही हैं .
वादियां मेरा दामन
रास्ते मेरी बाहें
जाओ मेरे सिवा
तुम कहां जाओगे .
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दर्द जब तेरी अता है तो गिला किससे करें
हिज्र जब तूने दिया हो तो मिला किससे करें
अक्स बिखरा है तेरा टूट के आईने के साथ
हो गई ज़ख़्म नज़र अक्स चुना किससे करें
मैं सफ़र में हूँ मेरे साथ जुदाई तेरी
हमसफ़र ग़म हैं तो फिर किसको जुदा किससे करें
खिल उठे गुल या खुले दस्त-ए-हिनाई तेरे
हर तरफ़ तू है तो फिर तेरा पता किससे करें
तेरे लब तेरी निगाहें तेरे आरिज़ तेरी ज़ुल्फ़
इतने ज़िंदा हैं तो इस दिल को रिहा किससे करें
.... मंजूर अहमद
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10.08.2021
आज यादें कुछ ज्यादा मायूस कर रही हैं . खासकर वह उनका और मेरा आखिरी सफर - शम्भूवाला से दिल्ली तक का . मैं अपनी कार में ही उनको ले गया था ... लेकिन पहली बार वो पिछली सीट पर लेटी थीं वरना हमेशा वे आगे वाली सीट पर मेरे साथ बैठती थीं . करनाल से आगे जा कर वो बोलीं कि मुझे बैठा दो . मैंने बैठा दिया और कार चलाता रहा . एक घण्टे बाद बोलीं कि अब मुझे लेटा दो . लिटा दिया . एक जगह एक गिलास मौसमी का जूस पिलाया . रात साढ़े आठ बजे एस्कार्ट दिल्ली पहुंचे . कार में जब तक थीं - होश में थीं . कार में ही उनके भाई ने पूछा - ठीक हो ? जवाब दिया - हाँ मैं ठीक हूँ .
कार से उतार कर अमरजेन्सी में ले गये ... उसके बाद कोई बात नहीं की . ये 5 अगस्त की बात है . फिर कई बार मैंने बात की पर जवाब न दिया . ऐसे जैसे कभी रूठ जाने पर किसी भी बात का जवाब नहीं देती थीं . मुझे नहीं मालूम था कि वो हमेशा के लिए रुठने वाली थीं . 7 अगस्त दोपहर 2-30 बजे मैं मिलने गया - देखा आंखे शून्य में खुली हुई थीं लेकिन सीना उठता बैठता हुआ सांसे लेने का आभास दे रहा था . शायद वेंटीलेटर की वजह से . मैंने सोचा खुली आंखों से तकलीफ हो रही होगी और मैंने उनकी पलकें बंद कर दी और बोला सो जाओ. फिर वो आंखें नहीं खुली उनकी . शायद वो तभी जा चुकी थीं और हमेशा के लिए सो चुकी थीं.
डाक्टरज़ ने पौने पाँच बजे बुलाया और बताया कि अब वो नहीं हैं . मैं तब बिल्कुल नहीं रोया क्योंकि मैं तो पहले ही 2-30 बजे खूब रो चुका था और जानता था कि वो अब नहीं थीं .
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16-9-21
तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया, साथ होगा
कभी मुझको याद करके, जो बहेंगे तेरे आँसू
तो वहीं पे रोक लेंगे, उन्हें आके मेरे आँसू
तू जिधर का रुख करेगा, मेरा साया, साथ होगा ...
तू अगर उदास होगा, तो उदास हूँगी मैं भी
नज़र आऊँ या ना आऊँ, तेरे पास हूँगी मैं भी
तू कहीं भी जा रहेगा, मेरा साया, साथ होगा ...
मैं अगर बिछड़ भी जाऊँ, कभी मेरा ग़म न करना
मेरा प्यार याद करके, कभी आँख नम न करना
तू जो मुड़के देख लेगा, मेरा साया, साथ होगा ...
मेरा ग़म रहा है शामिल, तेरे दुख में, तेरे ग़म में
मेरे प्यार ने दिया है, तेरा साथ हर जनम में
तू कोई जनम भी लेगा, मेरा साया साथ होगा .
. . . . राजा मेंहदी अली खान
पहले हमेशा इस गीत को सुन कर मुझ में एक सिहरन दौड जाती थी ... लेकिन अब साथ में आंसू भी आ जाते हैं क्योंकि गीता अक्सर इसे गाती रहती थी .
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17.9.21
मुझे डाक्टरज ने काफी पहले से संकेत दे दिये थे कि इतनी कम दिल के EF के साथ मेरी पत्नी के जीवन की कोई गारन्टी नहीं है और कोम्बो डिवाइस ( CRT-D) के सहारे जब तक खिंच जाए ... वो जी सकतीं हैं . लेकिन उनकी हिम्मत और इच्छाशक्ति के दम पर मुझे यकीन था कि जुदाई इतनी जल्दी नहीं होगी . लेकिन आखिर वो दिन जल्दी ही आ गया .
पहले - जब वो जिन्दा थीं और कोई कम्पलीकेशन हो जाती थी तो दो तीन सालों से एक ख्याल मुझे कई बार आया . मैं सोचता था कि अगर उन्हें मुझे छोड़ कर जाना पड गया तो कैसे जाएंगी क्योंकि शादी के बाद आज तक वो कहीं भी कभी भी अकेली नहीं गयीं ... किसी मन्दिर, बाज़ार, मायके, ससुराल, कहीं भी नहीं. लेकिन इस बार वो अकेली चली गयीं. पीछे एक गहरा सूनापन छोड कर.
अब उनके बिना मेरी जिंदगी कुछ जिम्मेवारियों के सिवा कुछ नहीं है. जुदाई क्या होती है अब समझ आया. ये वो जुदाई है जिसके बाद सब कुछ खत्म है - न कोई उम्मीद, ना इन्तज़ार.
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ये जो कुछ भी भावुकतापूर्ण सा - ग़म में डूबा हुआ सा लिखता हूं मैं, इसका भी एक सहारा है. कहना चाहिए एक ही सहारा है. मेरे बच्चे जानते हैं कि मम्मी - पापा के बीच कैसा गहरा प्यार था और वे समझते हैं कि पापा पर मम्मी के बिना क्या बीत रही होगी . मैं जानता हूँ कि मेरे बच्चों के लिये उनकी मम्मी क्या थी - उनकी पूरी दुनिया उनकी मम्मी थी . वे एक एक बात अपनी मम्मी से सांझा करते थे . उन पर आज क्या दुःखों का पहाड़ टूटा है मैं समझता हूँ . लेकिन मेरे बच्चे मेरे सामने ख़ुश रहने का अभिनय करते हैं और मैं उनके सामने ताकि एक-दूजे का मन बहल जाए. इसी अभिनय के खेल में वक्त गुज़र रहा है. शायद ज़िन्दगी ऐसे ही गुज़र जाए. बच्चों के पास अभी बहुत जिंदगी है - उनका अपना परिवार होगा ... शायद उनको भूलना आसान होगा लेकिन मेरे पास शायद यह अकेला जरिया रहेगा अपने मन को बहलाने का - लिखना.
और जब मैं ये सब लिखता हूँ और मुझे मालूम है कि तुम इसे पढ़ती हो और समझती भी हो साथ ही इस पर प्रतिक्रिया भी देती हो तो एक सुकूं सा मिलता है.
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तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है .
अब इसी गाने के बारे में कुछ न लिखूं यह हो नहीं सकता . इसमें सुरों की बात करें तो .... *इन्हीं पलकों के तले* को ठीक से गाना बहुत मुशिकल है और मैं तो कमी ठीक नहीं गा सका . हां वो गा लेती थीं . और मैं जब गलत गाता था तो वो मुझे रोक कर ठीक से गा कर सुनाती थीं और फिर कहती थीं - ऐसे गाओ .
सच में गीता - तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है . यह दुनिया शून्य है .
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18-09-21
अब समझ आ रहा है कि मैं उनकी यादों में कुछ ज्यादा ही खो गया हूं . तुम्हारा जन्मदिन निकल गया और मैंने उस दिन तुमसे इसी जगह बात की लेकिन पिछले कई सालों में पहली बार भूल गया . पिछले साल तक तो हर बार गीता याद दिलाया करती थीं और कहती थीं कि विश करना मत भूल जाना . वो सब के जन्मदिन याद रखती थी . परिवार वालों के . दोस्तों के और अपने पसन्दीदा फिल्म कलाकारों के .
चलो - बीता हुआ जन्मदिन तुम्हें मुबारिक और पूरे साल के लिये शुभकामनाऐं .
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21.9.21
आज गीता को गये 45 दिन हुए हैं . एक अधूरापन है जो कैसे भी पूरा नहीं हो सकता . जो भी सांत्वना देने आया , सबकुछ भूल कर जिन्दगी में आगे बढने का संदेश दे गया . मैं भी समझता हूँ इस बात को लेकिन आगे तो बढ सकता हूँ मगर भूल जाऊं ऐसा हो नहीं सकता और मैं चाहता भी नहीं . ऐसा लगता है कि ये यादें ही अब गीता की धरोहर हैं .
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22.09.2021
तुम जानती हो कि कम उम्र से मुझे (और तुम्हें भी) दर्दनाक कहानियां ही ज्यादा पसंद थीं . दिलीप कुमार की देवदास के तीन शो लगातार देखे थे मैंने. अज्ञेय की शेखर - एक जीवनी का my candle is burning from its both ends वाली पंक्तियां अभी भी याद हैं . इसी तरह आवारा मसीहा ( विष्णू प्रभाकर) उसने कहा था ( चं० ध ० शर्मा गुलेरी ) वगैरा -वगैरा . मुझे नहीं पता था यह दर्द क्यों इतना आकर्षित करता था . शायद भविष्य का मेरा प्रारब्ध था यह . मुझे लगता है कि यह जो आज दुःख आया है इसको आधा मैं पहले ही जी चुका था तभी सह पाया और जिन्दा हूं .
एक पाकिस्तानी टीवी सीरियल है : खुदा और मोहब्बत . इस के एक ही कहानी को अलग चेहरे लेकर सीजन one और सीजन Two पूरे टेलिकास्ट हो चुके है और मैं उन्हें पूरा देख चुका हूं. मोहब्बत के दर्द को सलीके से पर्दे पर उतारा है. अब इसी का सीजन 3 चल रहा है लेकिन बदली हुई कहानी के साथ. हर शुक्रवार को नया एपिसोड YouTube पर रिलीज होता है . इसके कुल 33 एपिसोडस आ चुके हैं . मैं इसे हर शुक्रवार देख रहा था लेकिन पीछे छूट गया था . अभी 25 तक देख चुका हूं . कल लगातार 3 एपिसोडस देखे . क्या फनकारी है - क्या डायलाग्ज हैं - सुपर .
कल नाडा साहिब गुरुद्वारा माथा टेकने गया था . उसी वक्त रागियों ने कैलाश खेर के सइयां की तरज पर शब्द शुरू किया . मैंने उसकी पूरी वीडियो बनाई . कम से कम दस बार मैं सपंदित हुआ और रोंये खडे हुये .
मुझे खुशी होती है कि मेरे तीनों बच्चे इस विषय में नार्मल हैं . . . मेरे जैसे नहीं हैं जो 15-16 की उमर में देवदास , नदी के द्वीप , पढ चुका था . मैंने हमेशा चाहा कि मेरे बच्चे इतने ज्यादा संवेदनशील न हों . पता नहीं क्यों .
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शम्भुवाला से दिल्ली तक का उनका आखिरी सफर . वो पिछली सीट पर लेटी थीं और मैं ड्राइव कर रहा था . बस हम दोनों ही साथ साथ थे .मैं बार बार बिना पीछे देखे पूछता था - ठीक हो ? वो जोर से जवाब देतीं - हाँ जी, ठीक हूँ. यही वे आखिरी शब्द थे जो उनके मुंह से मैंने सुने थे .
आज मैं 37 सेक्टर - चण्डीगढ़ से प्लेटलेटस ले कर पंचकुला की तरफ आ रहा था . कार में अकेला था . बीच में एक जगह मुझे पिछली सीट से आवाज आई - ठीक हूँ जी . वही प्यारी सी आवाज - मीठा बोल . मेरी आंखों में पानी भर आने से मुझे कार साइड में रोकनी पड़ गई .
मेरी सांसों में - रग रग में - रूह में वो रहती हैं . लेकिन फिर भी यह कैसा अकेलापन - कैसा सूनापन .
16.10.2021
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27.11.2021.
निर्दोष और मासूम. वो शायद इसलिए कि मैं हमेशा नितांत निर्दोष और मासूम लोगों से जुड़ा रहा . ये अलग बात है कि मेरी तरफ हर तरह के लोग आकर्षित होते थे - सम्पर्क में आते थे . जिनमें कुुछ ऐसे भी रहे जो वैसे हरगिज नहीं थे और दोस्ती में कुछ पाना भी चाहते थे लेकिन वहीं शीला जैसी नितांत निर्दोष और मासूम लड़की भी थी जो सिर्फ मेरा साथ चाहती थी और कुछ नहीं . तुम भी थीं और हो जिसने आज तक कुछ भी नहीं चाहा. इन लोगों से मैंने सीखा कि कैसे निस्वार्थ भाव से किसी से जुड़ा जा सकता है . उनकी उन्हीं खूबियों को आज भी मैं नहीं भूलता. निस्वार्थ प्रेम और समर्पण का सबसे बड़ा उदाहरण बन कर गीता मेरे जीवन में आई और इतना कुछ दे कर चली गई. कल किसी काम से उनकी अलमारी खोली मैंने और देर तक उनके कपड़ों में मुंह धंसाए रोता रहा. एक रिक्तता - अकेलेपन का एहसास.
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उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
ढूँढने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ
डाल कर ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी के मिटा भी न सकूँ
ज़ब्त कमबख़्त ने और आ के गला घोंटा है
के उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ
उस के पहलू में जो ले जा के सुला दूँ दिल को
नींद ऐसी उसे आए के जगा भी न सकूँ
नक्श-ऐ-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सजदे
सर मेरा अर्श नहीं है कि झुका भी न सकूँ
बेवफ़ा लिखते हैं वो अपनी कलम से मुझ को
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ
इस तरह सोये हैं सर रख के मेरे जानों पर
अपनी सोई हुई किस्मत को जगा भी न सकूँ
अमीर मिनाई
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10-04-2022
शादी के कार्ड बांट रहा हूं . बेशक एक महत्वपूर्ण समय है . मैं और अंकूं सारे इंतजाम में लगे हैं और कदम कदम पर गीता को याद करते हैं . कई बार दुविधा हो जाती है कि यह करें या वह करें . गीता के रहते ऐसा नहीं था . हमारे पास एक ही आप्शन रहता था - वो जो गीता कहती थी बस .
20.11.22
याद न जाए, बीते दिनों की
जाके न आये जो दिन, दिल क्यूँ बुलाए
दिन जो पखेरू होते, पिंजरे में मैं रख लेता
पालता उनको जतन से मोती के दाने देता
सीने से रहता लगाए
तस्वीर उनकी छुपाके, रख दूँ जहाँ जी चाहे
मन में बसी ये मूरत, लेकिन मिटी न मिटाए
कहने को है वो पराए
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30.04.2023
वो जब याद आए बहुत याद आए
ग़म-ए-ज़िंदगी के अंधेरे में हमने
चिराग-ए-मुहब्बत जलाए बुझाए
आहटें जाग उठीं रास्ते हंस दिये
थामकर दिल उठे हम किसी के लिये
कई बार ऐसा भी धोखा हुआ है
चले आ रहे हैं वो नज़रें झुकाए
दिल सुलगने लगा अश्क़ बहने लगे
जाने क्या-क्या हमें लोग कहने लगे
मगर रोते-रोते हंसी आ गई है
ख़यालों में आके वो जब मुस्कुराए
वो जुदा क्या हुए ज़िंदगी खो गई
शम्मा जलती रही रोशनी खो गई
बहुत कोशिशें कीं मगर दिल न बहला
कई साज़ छेड़े कई गीत गाए
आज से बहुत साल पहले , 1975 से ले कर एक दशक तक यह गीत दिलो दिमाग पर छाया रहा . तब बेशक बेहद पसंद था लेकिन गीत कहीं बाहर से सुनाई देता था और शब्दों के साथ हम कुछ कल्पना करते थे -क्योंकि अभी जिन्दगी को देखना समझना बाक़ि था .
आज यह गीत कहीं अंदर से सुनाई देता है . . . जैसे रूह गा रही हो .
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7 अगस्त 2023
जुदाई के तीन वर्ष पूरे होने पर
मैं और मेरी तन्हाई
अक्सर ये बातें करते हैं
तुम होतीं तो कैसा होता
तुम ये कहतीं तुम वो कहतीं
तुम इस बात पे हैरान होतीं
तुम उस बात पे कितनी हँसतीं
तुम होतीं तो ऐसा होता
तुम होतीं तो वैसा होता
मैं और मेरी तन्हाई
अक्सर ये बाते करते हैं
ये रात है या तुम्हारी
ज़ूल्फें खुली हुईं
है चाँदनी या तुम्हारी नज़रो से
मेरी रातें धूलि हुईं
ये चाँद है या तुम्हारा कंगन
सितारे हैं या तुम्हारा आँचल
हवा का झोंका है या
तुम्हारे बदन की खुशबु
ये पत्तियों की है सरसराहट
के कि तुमने चुपके से कुछ कहा
ये सोचता हूँ
मैं कबसे गुमसूम
जबकि मुझको भी ये खबर है
कि तुम नहीं हो - कहीं नहीं हो
मगर ये दिल है की कह रहा है
तुम यहीं हो - यहीं कहीं हो
*** साहिर लुधियानवी
निशि की टिप्पणी : लौट आओ गीता
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मैः वो कहीं और जन्म ले चुकी है . नन्ही सी - मासूम सी . एक नये जीवन के सफर में .
लेकिन मेरे लिए एक टीस सी छोड़ गयी हैं ... उसके बिना जीते रहने की बेबसी की टीस .
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निशि : गीता की मुहब्बत को अपनी ताकत बना कर मुस्कुराते रहना ।
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3 अक्तूबर 2023
सीमा ठाकुर : जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐 🙏इन सुनहरी यादों के साथ 🙏🏻🙏🏻
4 अक्तूबर 2023
सीमा ठाकुर : आज स्वप्न में मैडम दिखाई दी हमें। बहुत सुन्दर और पिंक कलर की सिर पर ओढ़नी लगाए हुए बहुत खुशी खुशी हलवा बाँट रखी थी सभी को और उनमें मैं भी थी।। 🙏🏻 लगा जैसे वो आपका जन्मदिन मना रही थी और माता का हलवे का प्रसाद सिर पर चुन्नी रख कर दे रही थी। 🕉️🙏🏻
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मैं :
नमस्कार . सुबह सुबह आपका संदेश पढ कर बहुत अच्छा लगा . अच्छा लगने में वर्ष के सर्वोतम मौसम का भी हाथ है
धन्यवाद 🙏🏻🌹
स्वप्न एक अंतर्मन की प्रतिक्रिया है और अंतर्मन आत्मा का ही प्रतिरूप है. गीता आपको अपने परिवार की तरह मानती थीं और बिछड़ने के बाद भी अक्सर आपके बारे में पूछा करती थी . आत्मजनों की संख्या बहुत कम थी - हाथ की उंगलियो से भी कम और उनमें से एक आपको मानती थीं .
नाडी और आपकी - बहुत सारी यादें हैं जो साकार हो गई है .
इस अपनत्व के लिए गीता की तरफ से धन्यवाद .
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
सीमा ठाकुर :
आप बहुत अच्छा लिखते हैं पोखरियाल जी। रचनाओं और संस्मरणों को लिख कर आपके साथ वो सदैव रहेगी🙏🏻🙏🏻
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मैं :
सही कहा आपने . और मैंने ऐसा किया भी है क्योंकि उनके जाने के बाद मुझे न चाहते हुए भी जीना था : बच्चों के लिए . उनकी मृत्यू पर एक गहरी खाई में मैं समा गया था जिससे बाहर निकलना जरूरी था . तो मैं रोज कुछ संस्मरण लिखता था और अपनी एक बचपन की दोस्त - निशि को व्हाट्सएप कर दिया करता था . लिखता था मैं word format में . यह एक यादों के संस्मरणों का संकलन बन गया जिसे नाम दिया है " मीलों है ख़ामोशी". यह क्योंकि अतिव्यकितगत अनुभूतियां हैं और जनसाधारण से सांझा नहीं की जा सकती . मैं आपको इसे साझा कर रहा हूं . आगे शेयर मत करना .
अभी हो सकता है आगे भी लिखूं .
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सीमा ठाकुर :
हम इसे छपवाना चाहते हैं 🙏 यदि आप कहें
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मैं : नहीं मैडम . यह, जैसा मैंने कहा , उस हिसाब से या उस फोर्मेट में नहीं लिखी गयी है . यह तो अपने मित्र को भेजे गये व्यक्तिगत सदेश हैं . यह एक मृत्युबोध की तरह है . यह मृत्यु से जीवन तक वापसी का एक लिपिबद्ध दस्तावेज मात्र है . इसमें कुछ भी प्रकाशन के योग्य नहीं है : और वैसे भी यह अभी अधूरा है .हां कभी मन किया तो ऐसा कुछ जरूर लिखूंगा .
अभी तो यह आपके पढ़ने के लिए मात्र है .. वो इसलिए कि आप इनमें छुपी व्यथा - दर्शन और उद्देश्य को समझने में सक्षम हैं ... ऐसा सरस्वती मां का आपको वरदान है .
आशा है कि मेरे इन्कार को अन्यथा न लेंगी .
इस आत्मीयतापूर्ण आग्रह के लिए आभार एवं धन्यवाद .
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सीमा ठाकुर :
She gifted me this laughing budhha on Diwali.. And I always kept this memory with me😭
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मैंः Yes. I remember that
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22 अक्तूबर 2023
आज दुर्गाअष्ठमी के दिन गीता की यादें ताजा हो गई हैं . कितने सालों से आज के दिन घर में एक धार्मिक वातावरण बनाए रखती थीं वो . जब तक रहीं - कभी अष्ठमी पूजने से नहीं चूकीं . नहा धो कर गीले बालों के साथ पवित्रता की साक्षात मूर्ति की तरह तन कर मन्दिर में बैठ कर पाठ करती थीं - ऊंचे स्वर में मन्त्रोच्चारण करते हुए एक दिव्य वातावरण का एहसास करवाती थीं वो .
आज मैं सोचता हूं कि मैंने क्या खोया है .
अभी पिछले दिनों एक फैन्टेसी फिल्म देखी थी - साउथ से हिन्दी में डब की हुई . पिछले जन्म में बिछड़े हुए पति पत्नि दूसरे जन्म में भी मिलते हैं … अगर ऐसी कल्पना का कोई यथार्थ रूप भी हो सकता है - जैसा कि ओशो ने भी जगह जगह कहा है - तो मैं अगले जनम में भी गीता को पत्नि रूप में पाना चाहूंगा .
क्योंकि आत्मा अमर है - आत्माऐं कभी नहीं मरतीं .
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17 June 2024
बिन तुम्हारे एक खालीपन ।
इस खालीपन की कोई अभिव्यक्ति नहीं ।
रात दिन का साथ निभाने वाली तुम -
मुझे रात दिन के लिए अकेला छोड़ गई .
मैं जानता हूं कि तुम मुझे छोड़ कर जाना नहीं चाहती थीं -
लेकिन
जाना पड़ा तुम्हें .
काश हम भाग्य के इस फैसले को बदल सकते - तो
तो तुम मेरे साथ होतीं
रात दिन के लिए -
अब नितान्त अकेला हूं .
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⬆️ कभी कभी खूब उदास होने का मन करता है . अजीब बात है, उदास तो ख़ुद -ब -खुद हुआ जाता है - यह उदास होने का मन करता है का क्या मतलब हुआ ? यानि उदास नहीं हूं और होने का मन करता है .
मैंने इसी *मीलो है ख़ामोशी* में शायद कहीं देवदास के बारे में लिखा है . जब 16-17 साल की उमर में मैंने देवदास पढ़ी और बाद में देखी (दिलीप कुमार साहब वाली ) तो लगातार तीन शो एक साथ देखे थे . ये वियोग से उत्पन्न निराशा और जीवन से विमोह के प्रति मेरा एक आकर्षण था जिसमें किशोर मन मान लेता है कि मेरे साथ कभी ऐसा हुआ तो मैं भी वही करूंगा.
और अब मेरे साथ भी वही हुआ - वैसा ही प्रगाढ़ प्रेम और उससे भी बड़ा अकाट्य वियोग जिसमें इस जन्म में फिरसे मिलने की कोई सम्भावना नहीं है । लेकिन मैं अपने फेवरिट देवदास की तरह क्यों नहीं हुआ ? नशे मे डूब कर ख़ुद को खत्म करने की कौशिश. जबकि मेरा प्यार उनसे रति भर भी कम नहीं था ।
-शायद अपनी जिम्मेवारियों की वजह से ।
नहीं ।
- क्योंकि गीता ऐसा कभी नहीं चाहती । वो भी नहीं ।
देवदास, मजनू की दुनिया में जाने के लिए एक मानसिक शॉक की जरूरत होती है जिसके बाद इन्सान एक अलग दुनिया में प्रवेश कर जाता है जहां *उनको मिले ख़ुदा है ख़ुदा की जिन्हें तलाश- मुझको तो बस इक झलक मेरे दिलदार की मिले* जैसी मानसिक स्थिति में वह रहता है.
शायद उसी शॉक की कमी रही . 14 साल से गीता का एक ही डाक्टर था - एस्कार्ट हार्ट इन्स्टीटयूट का डा० अनिल सक्सेना जो 14 साल से मुझे 07-08-2021 ( गीता की विदाई ) के लिए तैयार करता रहा - हर 6 महीने के बाद की consultation में वह मुझे इस दिन का संकेत देता रहा कि यह दिन कभी भी आ सकता है . फिर 7-8-21 को मैंने अपनी आंखों के सामने गीता को पल पल हमेशा के लिए दूर जाते देखा . जब मैंने गीता की पथराई आंखें अपने हाथों से बन्द की और शान्त मन से बोला - सो जाओ अब - अलविदा . फिर मिलेंगे . और उस के 3 घंटे के बाद डाक्टरज ने गीता को मृत घोषित किया . इन तीन घंटो में मैं रो लिया खूब और उसके बाद नहीं रोया . यह मेरी स्वीकृति थी - एक अकाट्य सत्य के लिए.
यही स्वीकृति मेरे काम आई और मैं इस दुनिया में वापिस आ सका ; गीता के बिना जीते हुए अपनी बाकि जिम्मेवारियां निभाने के लिए. हालाँकि एक बहुत बड़ा शून्य है जिसे मैं अपनी पीठ पर लादे घूमता रहता हूं - बहुत बड़ा शून्य - अकेलेपन से भरा हुआ शून्य !
अनिल अग्रवाल : तुम दोनो का प्यार खरा और खालिस है। तुम रूहों से जुदा नही हुए हो।
निशि : बहुत मन करता है कहूँ तुम अकेले नहीं हो। अकेलेपन की पीड़ा क्या होती है ...कह भी नहीं पाते
तुम खरा सोना हो जो तप रहा है. सदा खुश रहने की कला तुम्हें आती है. खुश रहो स्वस्थ रहो सुखी रहो
अनिल को : अनिल- कुछ बातें कहने में अच्छी लगती हैं और बेशक उनका असर भी बेहतर ही होता है - जैसे शरीर जुदा हुए हैं - रूह से एक हैं . लेकिन सच्चाई यही है कि यहां रूहें जुदा होती हैं . मैं इसी जन्म में हूं । गीता या तो दूसरा जनम ले चुकी है या अभी दो जन्मों के बीच transit में है . Transit में अगर है तो उसे सब कुछ याद होगा लेकिन दूसरे जनम के लिए मां को जो प्रसव की पीड़ा होती है उससे कहीं ज्यादा पीड़ा बच्चे को होती है जिसमें रूह की मेमोरी से पिछला सब कुछ मिट जाता है - कुछ को ही कुछ याद रह पाता है . इससे रूह का सम्बन्ध तो वहीं तक का होता है - यह विधि का विधान है .
निशि को : तुमने जो कहा सही कहा . मन ने जीवन में बहुत कुछ चाहा पर किया नहीं . जिस संदर्भ में तुमने कहा मैं अकेला नहीं हूं - भाग्यशाली हूं कि तुम लोग हो मेरे साथ और यह साथ है भी बहुत कीमती लेकिन एक दूरी बनाए हुए जो सही भी है । बात वो है जो अनिल ने कही है - रूहों की . ये कोई मुझ अकेले की कहानी नहीं है - बहुत लोगों की है जो अभिव्यक्त नही कर पाते । डबल बेड का एक हिस्सा जो खाली रहता है वैसा ही मन के अन्दर भी एक हिस्सा खाली रहता है । एक वक्त के बाद उस हिस्से में कोई दूसरा फिट बैठता नहीं । कुछ होता है जो वक्त के साथ Obsolete हो जाता है और उसका विकल्प कहीं मिलता भी नहीं । वो खालीपन मैं अपनी माँ के भीतर भी देखता हूं अब - ममता के बाद गुमान सिंह के भीतर भी वही है । उसे कोई नहीं भर सकता .
अनिल अग्रवाल :
अगर सांसारिक और तार्किक ढंग से सोचें तो तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो। तुम्हारा दर्द गहरा और शायद तुम्हारी उम्र जितना ही होगा । संयोग से अभी कुछ पहले ही
एक दिन जबकि मेरा पूरा परिवार और दामाद भी इकट्ठे थे तो यूहीं fun sake एक unknown palmist को सबने हाथ दिखाया। मेरे हाथ को देखकर उसने past में और मेरे चरित्र वा स्वभाव के बारे में जो भी बताया वो दंग कर देने वाला था। हम में से अधिकांश के मुंह खुले के खुले रह गए। रोशनी कम थी और palmist सिर्फ मेरी हथेली ही देख पा रहा था। लेकिन उसने एक बात बहुत विचलित करने वाली कह दी कि मेरी आयु औसत से ज्यादा होगी। मैं उसी दिन से कही गहरे में बेचैन और उदास हूं। अगरचे उसने ये नही कहा कि ऋतु की life छोटी होगी फिर भी ।
सांसारिक जीवन में दंपतियों को एक दूसरे से बिछड़ना तो पड़ेगा ही.. कौन कब अपने साथी से पहले चला जाए क्या पता। लेकिन तुम दोनो ने प्यार, दुख, सुख और ढेरों अनुभूतियां कम वक्त में भी एक औसत दंपति से काफी ज्यादा गहराई से भोगी हैं। तुम्हारे पास वो perennial reservoir of mixed memories हैं । एक दिन तुमने भाभी की याद ताजा करते हुए कहा था कि वो अक्सर गुनगुनाती थी, "मेरा साया साथ होगा" ..... की शिद्दत महसूस करते हुए ही मुझे लगता है कि metaphysically तुम दोनो अभी भी एक दूसरे से दूर नही हो। काश मैं तुम्हारे इस गम को किसी ढंग से share कर सकूं।
अनिल को : बात को समझ लेने से बड़ा ग़म को शेयर करने का दूसरा कोई तरीका नहीं है. मेरे मन की बातें तुम लोगों तक पहुंचती हैं - यही बड़ी बात है । कल की सोच कर आज उदास होने के बजाय इस जीवन को और शिद्दत से जियो ! जिनको हम प्यार करते हैं उन्हे ज्यादा से ज्यादा इस प्यार का एहसास कराओ - उन्हें Qty बताओ कि कितना प्यार करते हो - इतना -इतना ओर इतना - जितना समुद्र में पानी है - जितना आकाश में तारे हैं . हम इन शब्दों के बारे में कंजूसी बरतते हैं - इन्हें फिल्मी मानते हैं लेकिन यह जानों कि हम सब यही सुनना चाहते हैं .
अपने आज को भरपूर जिओ - यही वक्त है जब शरीर के आकर्षण से दिल ऊपर उठ कर रूहानी सम्बन्ध बनाता है. कुछ ऐसा करो कि कल जब जुदाई का वक्त आए तो ऐसा न लगे कि कुछ अधूरा रह गया !
सीमा ठाकुर : बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति नारायण जी 😭 हम इस अभिव्यक्ति में आपकी वेदना और समर्पण को समझ सकते हैं 🙏
सीमा ठाकुर को : 🙏🏻 वही जानते हुए इस अतिव्यक्तिगत संस्मरण को सांझा कर रहा हूं आपसे .
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3 जुलाई, 2024
बरसात की शुरुआत है . गर्मी का प्रकोप घटा है लेकिन हवा में जो उमस भर गई है वह अन्दर एक बेचैनी पैदा करती है . जब भी बारिश होती है मुझे खिड़की के पास बैठी हुई और बाहर बारिश को निहारती हुई गीता याद आती है . यह एक स्थाई मुद्रा थी गीता की जो सालों से देखता आया था मैं . मुद्रा एक ही थी - खिड़की के पास बैठ कर लगातार बाहर बारिश को निहारते हुए : लेकिन चेहरे के भाव बदलते हुए और उन्हें सालों के अनुसार याद करूं तो 1989 से 2020 तक कभी उदासी नही दिखाई दी - हमेशा खुश - आंखों मे एक चमक . बस 2021 की बरसात में मुझे याद है कि वह बहुत उदास सी बैठी बारिश को निहारती रहती थी . जैसे जानती थी कि यह परिवार के साथ आखिरी बारिश है । मै पूछता भी था - क्या सोच रही हो ? तो बस मुस्कुरा भर देती थीं - एक उदासी भरी मुस्कान . जिस खिड़की से बाहर देखती रहती थीं वो - वह खिड़की अब कूलर के कारण बन्द रहती है तो मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगता है क्योंकि कई बार वहां बैठ कर मैं भी गीता के अंदाज़ में बाहर बारिश को देखता रहा हूं यह कौशिश करते हुए कि जानूं वो ऐसा करते हुए क्या महसूस करती होगी क्या सोचती होगी . और ऐसा करते हुए लगता है कि वही उदासी मेरे चेहरे पर भी आ जाती होगी .
मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़ है
के उन्हीं की दी हुई चीज़ है
यही ग़म है अब मेरी ज़िंदगी
इसे कैसे दिल से जुदा करूँ
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क्रमशः
(To be continued.......)
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